BRICS 2026: 11 देश, 40% GDP और भारत की चौथी अध्यक्षता, जानिए कैसे बना दुनिया का बड़ा मंच
नई दिल्ली: दुनिया की बदलती आर्थिक और कूटनीतिक व्यवस्था में BRICS की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कभी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया गया एक आर्थिक विचार आज एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का रूप ले चुका है। वर्ष 2026 में भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है।
भारत सरकार के अनुसार मौजूदा BRICS समूह में 11 देश शामिल हैं। इनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब का नाम दिया गया है। इन देशों की संयुक्त हिस्सेदारी दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, करीब 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और लगभग 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार में बताई गई है।
BRICS क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
BRICS की कहानी किसी पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संगठन की तरह शुरू नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। Goldman Sachs के अर्थशास्त्री Jim O'Neill ने 2001 में BRIC शब्द का इस्तेमाल करते हुए ब्राजील, रूस, भारत और चीन को तेजी से उभरने वाली अर्थव्यवस्थाओं के रूप में सामने रखा था।
बाद में इन देशों के बीच राजनीतिक और आर्थिक संवाद बढ़ा और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला BRIC शिखर सम्मेलन हुआ। उस समय समूह में ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे।
इसके बाद दक्षिण अफ्रीका समूह से जुड़ा और BRIC का नाम BRICS हो गया। इसी विस्तार ने संगठन को केवल चार अर्थव्यवस्थाओं के संवाद से आगे बढ़ाकर एक व्यापक बहुपक्षीय मंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ाया।
2026 में भारत के लिए क्यों खास है BRICS?
भारत ने 1 जनवरी 2026 से BRICS की अध्यक्षता संभाली है। यह भारत की चौथी BRICS Chairship है। इससे पहले भारत 2012, 2016 और 2021 में समूह की अध्यक्षता कर चुका है। वर्ष 2026 इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS अपनी स्थापना के 20 वर्ष पूरे कर रहा है।
नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाला 18वां BRICS Summit भारत की अध्यक्षता का सबसे बड़ा आयोजन है। इसमें सदस्य देशों के नेताओं के साथ साझेदार देशों और अन्य आमंत्रित प्रतिनिधियों की भी भागीदारी हो रही है।
भारत ने रखी चार प्रमुख प्राथमिकताएं
भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता का मुख्य विषय है—“Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability”।
इसका आधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “Humanity First” और people-centric approach से जुड़ा है। भारत की अध्यक्षता के चार प्रमुख स्तंभ हैं:
1. Resilience यानी समुत्थानशीलता:
वैश्विक आर्थिक संकट, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा, स्वास्थ्य संकट और प्राकृतिक आपदाओं जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए अधिक मजबूत व्यवस्था तैयार करना।
2. Innovation यानी नवाचार:
नई तकनीक, डिजिटल व्यवस्था, AI, fintech और अन्य उभरती तकनीकों के माध्यम से विकास को गति देना।
3. Cooperation यानी सहयोग:
BRICS देशों के बीच व्यापार, वित्त, तकनीक, नीति और विकास से जुड़े क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाना।
4. Sustainability यानी संधारणीय विकास:
आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण, जलवायु और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी ध्यान में रखना।
भारत के आधिकारिक BRICS दस्तावेजों में इन्हीं चार प्राथमिकताओं को अध्यक्षता के प्रमुख आधार के रूप में रखा गया है।
BRICS में कितने देश हैं? सऊदी अरब को लेकर क्यों है चर्चा?
BRICS के विस्तार के बाद सदस्य देशों की संख्या को लेकर अक्सर भ्रम देखने को मिलता है। 2026 के भारत सरकार के आधिकारिक स्रोत में 11 देशों को BRICS सदस्य के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। इसमें सऊदी अरब भी शामिल है।
हालांकि, इंडोनेशिया के एक आधिकारिक बयान में 2025 में इंडोनेशिया को 10वां आधिकारिक सदस्य बताया गया था और उस समय सऊदी अरब के औपचारिक रूप से शामिल होने की स्थिति स्पष्ट नहीं मानी गई थी।
इसलिए BRICS की सदस्य संख्या पर जानकारी देते समय तारीख और स्रोत का उल्लेख करना जरूरी है। 2026 के भारतीय सरकारी स्रोतों के आधार पर मौजूदा सूची में 11 सदस्य देश हैं।
BRICS का विस्तार कैसे हुआ?
BRICS के शुरुआती पांच सदस्य ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका थे। इसके बाद समूह का विस्तार हुआ और मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात तथा इंडोनेशिया जैसे देश इससे जुड़े।
इस विस्तार ने BRICS को केवल कुछ बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह न रखकर एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक फैला हुआ मंच बना दिया।
इसके अलावा BRICS के साथ partner countries की व्यवस्था भी विकसित हुई है। इसका उद्देश्य ऐसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाना है जो पूर्ण सदस्य न होते हुए भी समूह के साथ विभिन्न क्षेत्रों में काम करना चाहते हैं।
BRICS का अपना बैंक क्यों महत्वपूर्ण है?
BRICS की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में New Development Bank यानी NDB को माना जाता है। बैंक की स्थापना का समझौता 2014 में हुआ और 2015 में यह औपचारिक रूप से स्थापित हुआ। इसका मुख्यालय शंघाई में है।
NDB का उद्देश्य विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में infrastructure तथा sustainable development projects के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।
भारत के लिए NDB का महत्व काफी बड़ा है। बैंक के आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2025 तक भारत में 32 परियोजनाओं के लिए लगभग 9.53 अरब डॉलर की financing approved थी।
यानी BRICS का प्रभाव केवल बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं है। इसके जरिए infrastructure और development projects के लिए वित्तीय सहयोग भी मिलता है।
डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश
BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और cross-border payments को आसान बनाने पर भी चर्चा होती रही है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार में स्थानीय currencies की भूमिका बढ़ाना है।
हालांकि BRICS की कोई साझा मुद्रा अभी स्थापित नहीं हुई है। इसलिए इसे “BRICS की नई करेंसी आ गई” जैसे दावों से जोड़ना सही नहीं होगा। मौजूदा चर्चा मुख्य रूप से local currency settlement, payment systems और वित्तीय सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ावा देने के प्रयासों को एक अतिरिक्त मंच मिल सकता है।
BRICS की निर्णय प्रक्रिया कैसे काम करती है?
BRICS की एक खास विशेषता इसका consensus-based approach है। इसका मतलब है कि समूह में महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की जाती है। इसे किसी सामान्य बहुमत वाले मतदान तंत्र की तरह समझना सही नहीं होगा।
यही व्यवस्था BRICS की ताकत भी है और चुनौती भी। अलग-अलग देशों के अपने राष्ट्रीय हित, विदेश नीति और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में सभी देशों के बीच किसी बड़े मुद्दे पर एक जैसी राय बनाना आसान नहीं होता।
रूस, चीन और भारत के अलग-अलग हित
BRICS में रूस और चीन जैसे बड़े देश हैं, वहीं भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य सदस्य अपनी अलग विदेश नीति प्राथमिकताओं के साथ काम करते हैं।
यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी देशों के साथ संबंध, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर सभी सदस्य देशों की सोच हमेशा एक जैसी नहीं रही है।
भारत BRICS को किसी एक देश या किसी पश्चिम-विरोधी सैन्य गठबंधन के रूप में देखने के बजाय विकास, वैश्विक दक्षिण की आवाज और बहुपक्षीय सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाने पर जोर देता रहा है।
यही कारण है कि BRICS को NATO जैसे सैन्य गठबंधन के बराबर रखना सही नहीं होगा। यह मुख्य रूप से राजनीतिक, आर्थिक और बहुपक्षीय सहयोग का मंच है।
BRICS के तीन प्रमुख सहयोग क्षेत्र
BRICS का सहयोग व्यापक रूप से तीन प्रमुख क्षेत्रों में देखा जाता है।
पहला है राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग, जिसमें विदेश मंत्रियों, सुरक्षा अधिकारियों और अन्य स्तरों पर संवाद शामिल है।
दूसरा है आर्थिक और वित्तीय सहयोग। इसमें व्यापार, निवेश, विकास वित्त, स्थानीय मुद्रा में लेनदेन और New Development Bank जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है।
तीसरा है सांस्कृतिक और people-to-people cooperation। शिक्षा, संस्कृति, युवा, विज्ञान, तकनीक और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देने के लिए भी विभिन्न गतिविधियां होती हैं।
2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता का संदेश
भारत की मौजूदा अध्यक्षता का संदेश केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है। इसका जोर resilience, innovation, cooperation और sustainability के जरिए एक अधिक inclusive और people-centric global framework पर है।
भारत द्वारा जारी BRICS लोगो में कमल की आकृति और विभिन्न रंगों का इस्तेमाल किया गया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार लोगो की पंखुड़ियों में BRICS सदस्य देशों के रंगों को शामिल किया गया है, जो diversity के बीच unity का संदेश देते हैं।
भारत के लिए BRICS का क्या महत्व है?
भारत के लिए BRICS कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, इससे भारत को Global South से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने का एक मजबूत मंच मिलता है।
दूसरा, NDB जैसे संस्थागत माध्यम से infrastructure financing के अवसर मिलते हैं।
तीसरा, ऊर्जा, व्यापार, तकनीक, digital payments और supply chains जैसे क्षेत्रों में नए सहयोग के रास्ते खुल सकते हैं।
चौथा, भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ अलग-अलग स्तरों पर संबंध जारी रख सकता है।
आगे BRICS के सामने क्या चुनौतियां हैं?
BRICS का विस्तार जितना बड़ा हुआ है, उसके सामने चुनौतियां भी उतनी ही बढ़ी हैं। अलग-अलग देशों की आर्थिक परिस्थितियां, विदेश नीतियां और क्षेत्रीय हित कई बार एक-दूसरे से अलग होते हैं।
सदस्य देशों के बीच व्यापार संतुलन, चीन का आर्थिक प्रभाव, क्षेत्रीय मतभेद, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों के साथ संबंध जैसे मुद्दे समूह के लिए चुनौती बने रह सकते हैं।
इसके बावजूद BRICS का बढ़ता आर्थिक और जनसांख्यिकीय आधार इसे वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण मंच बनाता है।
निष्कर्ष
BRICS की शुरुआत एक आर्थिक विचार से हुई थी, लेकिन दो दशकों में यह एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग मंच बन गया है। 2026 में भारत की चौथी अध्यक्षता और नई दिल्ली में होने वाला 18वां BRICS Summit इस संगठन के अगले चरण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लगभग आधी दुनिया की आबादी, करीब 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और लगभग 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करने वाला यह समूह अब वैश्विक दक्षिण की आवाज को अधिक प्रभावशाली बनाने की कोशिश कर रहा है।
आगे BRICS कितना प्रभावशाली बनता है, यह केवल नए देशों के जुड़ने पर नहीं बल्कि मौजूदा सदस्यों के बीच वास्तविक सहयोग, सहमति और ठोस परियोजनाओं पर निर्भर करेगा।