लखनऊ:लखनऊ में हाल ही में हुआ एक वरिष्ठ नागरिक जीवनसाथी परिचय सम्मेलन अपनी वजह से चर्चा में है। इस सम्मेलन में अलग-अलग जगहों से 90 बुजुर्ग पहुंचे। किसी ने जीवनसाथी खो दिया था, कोई लंबे समय से अकेला रह रहा था और कुछ लोगों के जीवन में परिवार होने के बावजूद ऐसा खालीपन था, जिसे वे एक साथी के साथ भरना चाहते थे।
इसी सम्मेलन में मध्य प्रदेश के विदिशा से आए 84 वर्षीय एक बुजुर्ग भी शामिल हुए। उनके पास करोड़ों रुपये की संपत्ति और दो मंजिला मकान होने की बात सामने आई, लेकिन जिंदगी के इस पड़ाव पर उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत किसी संपत्ति की नहीं, बल्कि एक ऐसे साथी की महसूस हो रही है जिसके साथ वे अपनी बाकी जिंदगी साझा कर सकें।
यह कहानी केवल एक बुजुर्ग की नहीं है। लखनऊ में आयोजित इस सम्मेलन ने वरिष्ठ नागरिकों के बीच बढ़ते अकेलेपन और परिवार से अलगाव जैसे सवालों को भी सामने ला दिया है।
84 वर्षीय बुजुर्ग क्यों पहुंचे लखनऊ?
मध्य प्रदेश के विदिशा से 84 वर्षीय बुजुर्ग अपने नाती के साथ लखनऊ पहुंचे थे। उनकी पत्नी का कोविड महामारी के दौरान निधन हो गया था। इसके बाद परिवार से दूरी बढ़ने के कारण उन्हें अकेलेपन का सामना करना पड़ा।
ऐसे में उन्होंने जीवन की दूसरी पारी के लिए एक साथी तलाशने का फैसला किया। इसी उद्देश्य से वे लखनऊ में आयोजित वरिष्ठ नागरिक जीवनसाथी परिचय सम्मेलन में पहुंचे।
उनकी कहानी का सबसे अहम पहलू यह है कि आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद अकेलापन उनकी जिंदगी की बड़ी परेशानी बन गया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सिर्फ पैसा, मकान और सुविधाएं किसी व्यक्ति को भावनात्मक रूप से खुश रख सकती हैं?
शायद नहीं। इंसान को उम्र के किसी भी पड़ाव पर बातचीत, अपनापन और साथ की जरूरत हो सकती है।
सम्मेलन में पहुंचे 90 बुजुर्ग
लखनऊ के पारा क्षेत्र में आयोजित इस परिचय सम्मेलन में 50 से 80 वर्ष तक की उम्र के लगभग 90 वरिष्ठ नागरिक शामिल हुए। इनमें 75 पुरुष और केवल 15 महिलाएं थीं। सम्मेलन में ऐसे लोग शामिल हुए जो अविवाहित थे, तलाकशुदा थे या किसी कारण से अपने जीवनसाथी को खो चुके थे।
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल शादी के लिए रिश्ता तलाशना नहीं था। यहां आए लोगों को एक-दूसरे से मिलने, बातचीत करने और अपने अनुभव साझा करने का अवसर भी मिला।
कई लोगों के लिए यह किसी नए रिश्ते की शुरुआत से ज्यादा उस अकेलेपन से बाहर निकलने की कोशिश थी, जो लंबे समय से उनके जीवन का हिस्सा बन चुका था।
30 साल से अकेली महिला को भी चाहिए एक साथी
सम्मेलन में दिल्ली से आई 55 वर्षीय महिला की कहानी भी सामने आई। उनके पति का निधन करीब तीन दशक पहले हो गया था। इसके बाद उन्होंने अकेले जीवन बिताया।
समय के साथ उनके बेटे बड़े हुए और अलग रहने लगे। अब उनकी इच्छा ऐसे साथी की है जिसके साथ वे रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी बातें साझा कर सकें।
उनकी जरूरत किसी बड़ी आर्थिक सहायता की नहीं, बल्कि ऐसे इंसान की है जो पास बैठकर बातचीत कर सके और उनकी बात सुन सके।
यही इस सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण बात भी सामने लाता है—कई बार अकेलापन पैसे या सुविधाओं की कमी से नहीं, बल्कि साथ की कमी से पैदा होता है।
माता-पिता की सेवा में बीत गई जिंदगी
प्रयागराज से पहुंची एक महिला ने अपनी जिंदगी का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनका काफी समय अपने बुजुर्ग माता-पिता की सेवा में बीत गया।
बाद में पिता की ओर से मिली कुछ संपत्ति उनके नाम हुई तो परिवार के अन्य सदस्यों से दूरी बढ़ गई। कुछ महीने पहले जब वह गंभीर रूप से बीमार हुईं, तब उन्हें अपने आसपास लोगों की कमी महसूस हुई।
अस्पताल में अकेले रहना उनके लिए एक ऐसा अनुभव रहा जिसने उन्हें जीवनसाथी की जरूरत का एहसास कराया।
उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि परिवार की जिम्मेदारियां निभाते-निभाते कई लोग अपने व्यक्तिगत जीवन और भावनात्मक जरूरतों को पीछे छोड़ देते हैं।
पेंशन अच्छी, मकान भी है, फिर भी अकेलापन
उन्नाव के 67 वर्षीय सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी भी सम्मेलन में जीवनसाथी की तलाश में पहुंचे। उन्हें करीब 42 हजार रुपये मासिक पेंशन मिलती है। बेटियों की शादी हो चुकी है और लखनऊ में उनका मकान भी है।
इसके बावजूद उनका कहना था कि परिवार की उपेक्षा के कारण अकेलापन भारी पड़ रहा है।
यह उदाहरण बताता है कि वरिष्ठ नागरिकों की समस्या को केवल आर्थिक नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। किसी व्यक्ति के पास नियमित पेंशन, घर और दूसरी सुविधाएं हो सकती हैं, लेकिन भावनात्मक सहयोग की कमी फिर भी परेशान कर सकती है।
महिलाओं की संख्या इतनी कम क्यों रही?
सम्मेलन में 75 पुरुषों के मुकाबले केवल 15 महिलाएं पहुंचीं। यानी पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी ज्यादा थी।
आयोजकों ने इसके पीछे सामाजिक सोच और पारिवारिक-सामाजिक बंदिशों को एक वजह बताया। खासतौर पर उम्र बढ़ने के बाद महिलाओं के दोबारा रिश्ता बनाने को लेकर समाज में अब भी कई तरह की धारणाएं मौजूद हैं।
वरिष्ठ महिलाओं के लिए दोबारा साथी चुनने का फैसला कई बार सिर्फ व्यक्तिगत निर्णय नहीं रह जाता। परिवार क्या कहेगा, रिश्तेदार क्या सोचेंगे और समाज की प्रतिक्रिया कैसी होगी—ये सवाल भी उनके सामने होते हैं।
इसी वजह से ऐसे आयोजनों में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
संस्था का क्या है उद्देश्य?
आयोजकों के अनुसार, वरिष्ठ नागरिकों के लिए इस तरह के जीवनसाथी परिचय सम्मेलन लंबे समय से आयोजित किए जा रहे हैं। संस्था से जुड़े पदाधिकारियों ने बताया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कार्यक्रम किए गए हैं और लखनऊ का आयोजन उनके लिए महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।
आयोजकों के मुताबिक उनका उद्देश्य ऐसे लोगों को एक मंच उपलब्ध कराना है जिन्होंने जीवनसाथी खो दिया है या लंबे समय से अकेले जीवन बिता रहे हैं।
संस्था की ओर से यह भी बताया गया कि दूर-दराज से आने वाली कुछ महिलाओं के लिए ठहरने की व्यवस्था और जरूरतमंद प्रतिभागियों के आने-जाने में सहायता जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
क्या बुजुर्गों को दोबारा साथी की जरूरत होती है?
इस सवाल का जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है।
किसी के लिए जीवनसाथी की तलाश का मतलब विवाह हो सकता है, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति के लिए यह केवल एक अच्छे दोस्त या साथी की तलाश हो सकती है। उम्र बढ़ने के साथ रिश्तों की जरूरत खत्म नहीं होती। बल्कि कई लोगों के लिए बातचीत और भावनात्मक साथ का महत्व और बढ़ जाता है।
बच्चे अपनी नौकरी, परिवार और दूसरी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो सकते हैं। ऐसे में माता-पिता के पास आर्थिक सुविधाएं होने के बावजूद रोजमर्रा की जिंदगी में बातचीत और साथ की कमी महसूस हो सकती है।
इसलिए वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों को केवल भोजन, घर और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं है। भावनात्मक और सामाजिक जुड़ाव भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह कहानी समाज के लिए क्या संदेश देती है?
लखनऊ का यह सम्मेलन एक दिलचस्प खबर से कहीं ज्यादा गंभीर सामाजिक सवाल सामने रखता है।
84 साल का व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद साथी तलाश रहा है। 55 साल की महिला वर्षों से अकेली जिंदगी जीने के बाद बातचीत करने वाले साथी की तलाश कर रही है। सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी के पास पेंशन और मकान है, फिर भी उन्हें अकेलापन महसूस होता है।
इन सभी कहानियों में एक बात समान दिखाई देती है—इंसान को केवल आर्थिक सुरक्षा नहीं, बल्कि अपनापन और संवाद भी चाहिए।
वरिष्ठ नागरिकों के मामले में परिवार और समाज दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों के पास समय कम हो सकता है, लेकिन माता-पिता से बातचीत और उनके साथ समय बिताने की जरूरत खत्म नहीं होती।
साथ ही, यदि कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी इच्छा से जीवन के इस पड़ाव पर नया साथी चुनना चाहता है, तो उसके निर्णय को केवल उम्र के आधार पर गलत नहीं माना जाना चाहिए।
अकेलापन सिर्फ बुजुर्गों की निजी समस्या नहीं
अक्सर अकेलेपन को व्यक्ति की निजी परेशानी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन तेजी से बदलते पारिवारिक ढांचे में यह एक व्यापक सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है।
बच्चों का दूसरे शहरों या देशों में चले जाना, पति या पत्नी का निधन, तलाक, परिवार के सदस्यों से दूरी और सामाजिक संपर्क कम होना—इनमें से कई कारण किसी वरिष्ठ नागरिक को अकेलेपन की स्थिति में पहुंचा सकते हैं।
ऐसे में परिवार के साथ-साथ समाज में भी ऐसे मंचों की जरूरत हो सकती है जहां वरिष्ठ नागरिक सुरक्षित माहौल में लोगों से मिल सकें, बातचीत कर सकें और अपनी पसंद के अनुसार आगे का जीवन तय कर सकें।
निष्कर्ष
लखनऊ में हुआ वरिष्ठ नागरिक जीवनसाथी परिचय सम्मेलन इसलिए चर्चा में आया क्योंकि यहां 90 बुजुर्ग अपने लिए हमसफर की तलाश में पहुंचे। इनमें 84 वर्षीय बुजुर्ग से लेकर वर्षों से अकेली जिंदगी बिता रहीं महिलाएं और सेवानिवृत्त लोग शामिल थे।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि उम्र बढ़ने के साथ इंसान की भावनात्मक जरूरतें खत्म नहीं होतीं।
करोड़ों की संपत्ति हो या अच्छी पेंशन, घर हो या परिवार—अगर बातचीत करने वाला और सुख-दुख साझा करने वाला कोई न हो तो अकेलापन महसूस हो सकता है।
इसलिए वरिष्ठ नागरिकों के जीवन को सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनकी भावनात्मक जरूरतों और सामाजिक जुड़ाव से भी समझने की जरूरत है।
नोट: इस रिपोर्ट में सम्मेलन और प्रतिभागियों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों तथा दिए गए वीडियो कंटेंट के आधार पर प्रस्तुत की गई है। व्यक्तिगत प्रतिभागियों के निजी दावों को उनके अनुभव/बयान के रूप में ही समझा जाना चाहिए।