Haiwaan Movie Review: अक्षय कुमार और सैफ अली खान की फिल्म कैसी है? कहानी से ज्यादा एक्टिंग ने जीता दिल
Haiwaan Movie Review: अक्षय कुमार और सैफ अली खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘हैवान’ आज यानी 11 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म का निर्देशन प्रियदर्शन ने किया है और इसमें अक्षय कुमार, सैफ अली खान, बोमन ईरानी, सैयामी खेर और श्रिया पिलगांवकर जैसे कलाकार नजर आते हैं। फिल्म की अवधि करीब 2 घंटे 44 मिनट है और इसे UA 16+ प्रमाणन मिला है।
फिल्म की रिलीज से पहले सबसे ज्यादा चर्चा दो बातों को लेकर थी—एक तरफ लंबे समय बाद अक्षय कुमार और सैफ अली खान की साथ वापसी और दूसरी तरफ प्रियदर्शन का निर्देशन। फिल्म को लेकर यह भी लगातार चर्चा रही कि यह प्रियदर्शन की 2016 में आई मलयालम फिल्म ‘ओप्पम’ का हिंदी रूपांतरण है।
लेकिन अगर ‘हैवान’ को केवल पुरानी फिल्म से तुलना करके देखा जाए तो शायद फिल्म का अपना अनुभव ठीक से समझ नहीं आएगा। इसलिए इस समीक्षा में कहानी के बड़े स्पॉइलर से बचते हुए बात करेंगे कि फिल्म की सबसे मजबूत और सबसे कमजोर बातें क्या हैं, अक्षय और सैफ की परफॉर्मेंस कैसी है और क्या इसे थिएटर में देखने लायक माना जा सकता है।
‘हैवान’ की कहानी क्या है?
फिल्म की कहानी एक ऐसे संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें सैफ अली खान एक नेत्रहीन किरदार श्याम की भूमिका में हैं। उनकी जिंदगी एक बच्ची से जुड़ जाती है और इसी के बाद मामला बेहद गंभीर हो जाता है।
दूसरी तरफ अक्षय कुमार परशुराम के किरदार में दिखाई देते हैं। यह अक्षय का सामान्य हीरो वाला अंदाज नहीं है। उनके किरदार में गुस्सा, जुनून और बदले की भावना कहानी को आगे बढ़ाती है।
फिल्म का मूल संघर्ष इसी सवाल से पैदा होता है कि आखिर परशुराम किस वजह से इस रास्ते पर पहुंचा और श्याम उस बच्ची को बचाने के लिए किस तरह उसके सामने खड़ा होता है।
ट्रेलर से ही साफ था कि फिल्म में बदले, अपराध और इंसानी रिश्तों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन पूरी कहानी का आनंद लेने के लिए फिल्म के अहम ट्विस्ट पहले से जान लेना सही नहीं होगा। इसलिए यहां कहानी के निर्णायक हिस्से को जानबूझकर उजागर नहीं किया जा रहा है।
पहला हाफ कैसा है?
‘हैवान’ का पहला हिस्सा फिल्म की मजबूत कड़ियों में शामिल दिखाई देता है। शुरुआत में फिल्म धीरे-धीरे अपने किरदारों और परिस्थितियों को स्थापित करती है।
यही चीज फिल्म को तुरंत भागने वाली कहानी बनने से बचाती है। दर्शक को यह समझने का मौका मिलता है कि मुख्य किरदार कौन हैं और उनके बीच टकराव की वजह क्या है।
पहले हिस्से में सस्पेंस बनाए रखने की कोशिश की गई है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, दर्शक के मन में यह सवाल बढ़ता जाता है कि आगे क्या होने वाला है।
यहीं सैफ अली खान का किरदार काफी प्रभाव छोड़ता है। नेत्रहीन व्यक्ति की भूमिका निभाना केवल आंखें बंद करके कैमरे के सामने खड़े होने तक सीमित नहीं है। शरीर की चाल, चेहरे का भाव, आसपास की आवाजों पर प्रतिक्रिया और परिस्थितियों को महसूस करने का तरीका इस किरदार की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बन जाता है।
सैफ इस पहलू को काफी गंभीरता से निभाते नजर आते हैं।
सैफ अली खान की एक्टिंग सबसे बड़ी ताकत?
फिल्म देखने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी एक परफॉर्मेंस की हो सकती है तो वह सैफ अली खान की है।
उनका किरदार देखने में साधारण लग सकता है, लेकिन अभिनय की दृष्टि से यह चुनौतीपूर्ण भूमिका है। फिल्म में उनका किरदार देखने की क्षमता के बिना परिस्थितियों को समझने और उनका सामना करने की कोशिश करता है।
सैफ ने किरदार को केवल संवादों से निभाने के बजाय बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के भावों पर भी काफी निर्भर किया है।
खासकर वे दृश्य जहां उनके किरदार को बिना देखे आसपास की स्थिति को समझना होता है, वहां अभिनय का असर ज्यादा महसूस होता है।
यही वजह है कि फिल्म के कई हिस्सों में सैफ अपने अभिनय से कहानी की कमजोरियों को भी संभालते दिखाई देते हैं।
अगर आप सैफ अली खान की अलग तरह की भूमिकाएं देखना पसंद करते हैं, तो ‘हैवान’ में उनका काम फिल्म देखने की बड़ी वजह बन सकता है।
अक्षय कुमार का नया अंदाज
अक्षय कुमार इस फिल्म में ऐसी भूमिका में हैं जिसे उनके प्रशंसकों ने उनके करियर में बहुत कम देखा है।
परशुराम का किरदार सकारात्मक नायक के बजाय कहानी के अंधेरे पक्ष से जुड़ा हुआ है। अक्षय ने इस किरदार को केवल गुस्से वाला विलेन बनाने के बजाय उसमें कई अलग-अलग भाव रखने की कोशिश की है।
उनके चेहरे के हावभाव, बोलने के तरीके और आवाज के उतार-चढ़ाव में किरदार की मानसिक स्थिति दिखाई देने की कोशिश की गई है।
कुछ दृश्यों में अक्षय का स्क्रीन प्रेजेंस काफी मजबूत लगता है। वह जब कहानी के सामने आते हैं तो माहौल का टोन अचानक बदल जाता है।
अक्षय के प्रशंसकों के लिए यह उनके करियर की उन भूमिकाओं में से एक हो सकती है, जिसमें अभिनेता को सामान्य हीरो वाली छवि से बाहर निकलते हुए देखा जा सकता है।
हालांकि फिल्म की पटकथा हर जगह उनके किरदार को उतनी गहराई नहीं दे पाती जितनी एक बेहतरीन साइकोलॉजिकल थ्रिलर में उम्मीद की जाती है।
प्रियदर्शन का निर्देशन कैसा है?
प्रियदर्शन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अलग-अलग टोन को एक साथ संभालने का अनुभव रखते हैं।
‘हैवान’ में भी उन्होंने थ्रिल, एक्शन, भावनात्मक परिस्थितियों और कुछ हल्के पलों को साथ रखने की कोशिश की है।
फिल्म के शुरुआती हिस्से में निर्देशन अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावी लगता है। किरदारों की स्थापना और तनाव को धीरे-धीरे बढ़ाने का तरीका काम करता है।
लेकिन दूसरे हिस्से में पहुंचने के बाद कहानी की दिशा कुछ हद तक पहले से समझ आने लगती है। यहां फिल्म का सस्पेंस उतना मजबूत नहीं रह जाता जितना शुरुआत में दिखाई देता है।
यही फिल्म की सबसे बड़ी समस्या बन जाती है।
दूसरा हाफ क्यों कमजोर पड़ता है?
इंटरवल के बाद फिल्म कहानी को आगे ले जाती है, लेकिन कुछ समय बाद घटनाओं का अनुमान लगाना आसान होने लगता है।
एक थ्रिलर के लिए सबसे जरूरी चीज होती है कि दर्शक लगातार यह सोचता रहे कि आगे क्या होगा। ‘हैवान’ कुछ हिस्सों में यह काम बहुत अच्छी तरह करती है, लेकिन पूरी फिल्म के स्तर पर वही प्रभाव कायम नहीं रह पाता।
कुछ घटनाएं ऐसी लगती हैं जिनका अंदाजा पहले लगाया जा सकता है।
फिल्म की लंबाई भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। करीब 2 घंटे 44 मिनट की फिल्म में अगर स्क्रीनप्ले लगातार तनाव बनाए रखे तो अवधि महसूस नहीं होती, लेकिन जब कहानी की गति थोड़ी कम होती है तो वही लंबाई महसूस होने लगती है।
क्या फिल्म की कहानी में नयापन है?
यहां ‘हैवान’ को लेकर ईमानदारी जरूरी है।
फिल्म का कॉन्सेप्ट अपने आप में ऐसा नहीं है जिसे देखकर दर्शक कहे कि भारतीय थ्रिलर सिनेमा में पहली बार ऐसा कुछ देखने को मिला है।
कहानी बदले, अपराध, परिवार और एक मासूम किरदार की सुरक्षा जैसे परिचित तत्वों से बनी है।
इसलिए अगर आप फिल्म से बिल्कुल नया और पूरी तरह अप्रत्याशित प्लॉट खोजने जाएंगे तो निराश हो सकते हैं।
फिल्म की असली ताकत उसके कलाकारों और कुछ खास दृश्यों में है, न कि उसकी कहानी की मौलिकता में।
और यहां यह तथ्य भी साफ रखना जरूरी है कि ‘हैवान’ को प्रियदर्शन की 2016 की मलयालम फिल्म ‘ओप्पम’ से आधिकारिक रूप से जोड़ा गया है और इसे हिंदी रूपांतरण के रूप में रिपोर्ट किया गया है। इसलिए दोनों फिल्मों की तुलना होना स्वाभाविक है।
सपोर्टिंग कास्ट का काम
अक्षय और सैफ के अलावा फिल्म में बोमन ईरानी, सैयामी खेर, श्रिया पिलगांवकर और दूसरे कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं।
बोमन ईरानी जैसे अनुभवी अभिनेता अपने किरदार में सहज नजर आते हैं। हालांकि फिल्म का सबसे ज्यादा फोकस मुख्य टकराव पर रहने के कारण सहायक किरदारों को हमेशा उतनी जगह नहीं मिलती जितनी एक बड़े कलाकारों वाली फिल्म से उम्मीद की जाती है।
कुछ कलाकार कहानी को आगे बढ़ाने का काम करते हैं, लेकिन दर्शक का ध्यान बार-बार अक्षय और सैफ की भिड़ंत की तरफ चला जाता है।
क्या ‘हैवान’ थिएटर में देखनी चाहिए?
अगर आपकी पहली प्राथमिकता अक्षय कुमार और सैफ अली खान की एक्टिंग है, तो फिल्म को एक मौका दिया जा सकता है।
अगर आपको क्राइम और थ्रिलर फिल्में पसंद हैं और आप ऐसी कहानी देखना चाहते हैं जिसमें मुख्य किरदार लगातार खतरे के बीच फंसा हो, तब भी फिल्म आपके लिए काम कर सकती है।
लेकिन अगर आप केवल एक बहुत ही अनोखी कहानी, लगातार चौंकाने वाले ट्विस्ट और पूरी तरह unpredictable screenplay की उम्मीद लेकर जाएंगे, तो फिल्म आपकी उम्मीद पूरी नहीं कर सकती।
फिल्म की अच्छी बात यह है कि इसके मुख्य कलाकार कमजोर नहीं पड़ते। समस्या ज्यादा स्क्रीनप्ले के स्तर पर दिखाई देती है।
‘हैवान’ की सबसे अच्छी और कमजोर बातें
मजबूत पक्ष:
सैफ अली खान की परफॉर्मेंस
अक्षय कुमार का अलग तरह का किरदार
शुरुआती हिस्से का सेटअप
कुछ प्रभावी थ्रिलर सीक्वेंस
प्रियदर्शन का निर्देशन अनुभव
मुख्य कलाकारों के बीच टकराव
कमजोर पक्ष:
कहानी में बहुत ज्यादा नयापन नहीं
दूसरे हिस्से में सस्पेंस का असर कम होना
कुछ जगह घटनाओं का अनुमान लग जाना
लंबा रनटाइम
स्क्रीनप्ले हर जगह समान मजबूती से काम नहीं करता
दर्शकों और समीक्षकों की राय एक जैसी नहीं
रिलीज के शुरुआती घंटों में फिल्म को लेकर राय पूरी तरह एक जैसी नहीं दिख रही है। कुछ दर्शक अक्षय और सैफ की परफॉर्मेंस तथा फिल्म के इंटेंस हिस्सों की तारीफ कर रहे हैं, जबकि कुछ समीक्षाओं में कहानी, गति और स्क्रीनप्ले को कमजोर बताया गया है।
यानी ‘हैवान’ को लेकर सबसे सही तस्वीर यही है कि फिल्म mixed response की तरफ जाती दिखाई दे रही है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रिलीज के पहले दिन की सोशल मीडिया प्रतिक्रियाएं अंतिम बॉक्स ऑफिस नतीजे का प्रमाण नहीं होतीं। असली तस्वीर आने में कुछ दिन लग सकते हैं।
अंतिम फैसला
‘हैवान’ एक ऐसी फिल्म है जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसके कलाकार हैं।
सैफ अली खान ने नेत्रहीन किरदार में गंभीरता दिखाई है और अक्षय कुमार ने अपने सामान्य नायक वाले अंदाज से हटकर अलग रंग दिखाने की कोशिश की है।
प्रियदर्शन का निर्देशन फिल्म को संभालता है, खासकर शुरुआती हिस्से में। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, स्क्रीनप्ले की सीमाएं सामने आने लगती हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी कमी यही है कि जिस स्तर का सस्पेंस और कहानी की गहराई एक बड़े स्टारकास्ट वाली थ्रिलर से उम्मीद की जाती है, वह हर हिस्से में कायम नहीं रहती।
फिर भी अगर आप अक्षय कुमार और सैफ अली खान को एक गंभीर थ्रिलर में आमने-सामने देखना चाहते हैं, तो ‘हैवान’ को थिएटर में देखा जा सकता है।
हमारी राय: एक्टिंग के लिए फिल्म मजबूत, लेकिन कहानी और स्क्रीनप्ले के स्तर पर औसत।
रेटिंग: 3/5
नोट: यह समीक्षा स्पॉइलर से बचते हुए फिल्म के अभिनय, निर्देशन, कहानी और स्क्रीनप्ले का आकलन करती है। दर्शकों की राय अलग हो सकती है।