Su-57 पर भारत को मिल सकता है बड़ा टेक्नोलॉजी पैकेज? उत्पादन से लेकर हथियार इंटीग्रेशन तक क्या है रूस का प्रस्ताव
भारत और रूस के बीच पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान Su-57 को लेकर चर्चा ने एक बार फिर रक्षा क्षेत्र में दिलचस्पी बढ़ा दी है। मामला सिर्फ रूस से तैयार फाइटर जेट खरीदने तक सीमित नहीं बताया जा रहा, बल्कि भारत में उत्पादन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, मेंटेनेंस क्षमता और भारतीय प्रणालियों के साथ इंटीग्रेशन जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में हैं।
सितंबर 2026 में रूस की ओर से Su-57 को लेकर दिए गए बयानों और भारत-रूस वार्ता के बीच यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि अगर दोनों देशों के बीच कोई समझौता आगे बढ़ता है, तो भारत को केवल विमान मिलेगा या उसके साथ उत्पादन और तकनीकी क्षमताओं में भी बड़ी भागीदारी मिलेगी।
रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने 8 सितंबर 2026 की ब्रीफिंग में कहा था कि भारत Su-57 के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में रुचि रखता है और इस विषय पर बातचीत चल रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जटिल सैन्य तकनीक को साझा करना संवेदनशील विषय है और इस पर आगे चर्चा की जरूरत है।
Su-57 क्या है?
Su-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ मल्टीरोल फाइटर है। इसे हवा से हवा और हवा से जमीन जैसे अलग-अलग मिशनों के लिए विकसित किया गया है। विमान की खासियतों में स्टेल्थ डिजाइन, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और आधुनिक हथियारों के साथ काम करने की क्षमता शामिल है।
यही कारण है कि भारत के लिए Su-57 की संभावित खरीद को केवल एक और फाइटर जेट की खरीद के रूप में नहीं देखा जा रहा है। अगर इसके साथ उत्पादन और तकनीकी सहयोग भी आगे बढ़ता है, तो इसका असर भारत की एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग और भविष्य की अपग्रेड क्षमता पर भी पड़ सकता है।
सिर्फ फाइटर खरीदने और भारत में उत्पादन में बड़ा अंतर
अगर भारत रूस से तैयार Su-57 खरीदता है, तो यह मुख्य रूप से एक पारंपरिक रक्षा खरीद होगी। लेकिन अगर विमान के उत्पादन से जुड़ी तकनीक और औद्योगिक क्षमता भारत में विकसित होती है, तो सौदे का स्वरूप काफी अलग हो जाएगा।
रिपोर्टों में भारत के लिए 36 से 60 Su-57 विमानों की संभावित संख्या का उल्लेख किया गया है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे अंतिम संख्या नहीं माना जा सकता। कीमत, अंतिम संख्या और डिलीवरी टाइमलाइन पर कोई अंतिम सार्वजनिक समझौता सामने नहीं आया है।
भारत में उत्पादन की स्थिति भी अभी प्रस्ताव और बातचीत के स्तर पर है। ऐसे में इसे पक्का लाइसेंस प्रोडक्शन समझना जल्दबाजी होगी।
भारत में Su-57 का उत्पादन क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?
भारत पहले से ही Su-30MKI जैसे रूसी मूल के लड़ाकू विमानों के निर्माण और रखरखाव में लंबा अनुभव रखता है। ऐसे में यदि भविष्य में Su-57 का कोई स्थानीय उत्पादन मॉडल तय होता है, तो भारत के मौजूदा एयरोस्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक अनुभव का इस्तेमाल किया जा सकता है।
आपके दिए कंटेंट में HAL के नासिक प्लांट को संभावित विकल्प के रूप में बताया गया है। हालांकि किसी अंतिम Su-57 उत्पादन लाइन के लिए नासिक को आधिकारिक रूप से तय किया गया है, ऐसा अभी नहीं कहा जा सकता।
स्थानीय उत्पादन का बड़ा फायदा यह होगा कि भारत केवल तैयार विमान लेने के बजाय निर्माण, रखरखाव और भविष्य के अपग्रेड से जुड़ी क्षमताओं को भी मजबूत कर सकता है।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर असली मुद्दा क्यों है?
Su-57 से जुड़ी चर्चा का सबसे संवेदनशील हिस्सा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर है।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का अर्थ केवल विमान की ड्रॉइंग या असेंबली तकनीक हासिल करना नहीं होता। असली सवाल यह होता है कि भारत को उत्पादन प्रक्रिया, रखरखाव, ओवरहॉल, एवियोनिक्स, मिशन सिस्टम और भविष्य के अपग्रेड में कितनी स्वतंत्रता मिलेगी।
यही वह बिंदु है जो किसी सामान्य विदेशी फाइटर सौदे और गहरे औद्योगिक सहयोग के बीच अंतर पैदा कर सकता है।
हालांकि Su-57 के मामले में भारत को कितनी संवेदनशील तकनीक वास्तव में मिलेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे अभी से “फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर” कहना सही नहीं होगा।
क्या भारत को Su-57 का सोर्स कोड मिलेगा?
Su-57 को लेकर चर्चा में सोर्स कोड और सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर का मुद्दा भी सामने आया है। लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा।
किसी विमान के सॉफ्टवेयर तक सीमित तकनीकी पहुंच और पूरे सोर्स कोड की उपलब्धता एक ही बात नहीं है।
अगर किसी भविष्य के समझौते में भारत को मिशन सिस्टम और सॉफ्टवेयर में पर्याप्त तकनीकी स्वतंत्रता मिलती है, तो इससे भारतीय सेंसर और हथियार प्रणालियों को इंटीग्रेट करने की क्षमता बढ़ सकती है।
लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि रूस भारत को कितने स्तर तक सोर्स कोड या संवेदनशील सॉफ्टवेयर तकनीक देने के लिए तैयार है। इसलिए इस विषय को संभावित प्रस्ताव या बातचीत के रूप में ही देखना चाहिए।
भारतीय हथियारों का Su-57 के साथ इंटीग्रेशन
भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण मुद्दा स्वदेशी हथियारों का इंटीग्रेशन हो सकता है।
भारत लंबे समय से अपनी रक्षा प्रणालियों और हथियारों को देश में विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में किसी विदेशी फाइटर के साथ भारतीय हथियारों और सेंसर को जोड़ने की क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है।
Astra जैसी भारतीय एयर-टू-एयर मिसाइल के इंटीग्रेशन को लेकर चर्चा इसी संदर्भ में देखी जा सकती है। हालांकि किसी भी हथियार को किसी नए विमान पर शामिल करना केवल उसे विमान पर लगाने का मामला नहीं होता। इसके लिए विमान के मिशन सिस्टम, इंटरफेस और परीक्षण से जुड़े कई तकनीकी चरण होते हैं।
इसलिए भारतीय हथियारों के इंटीग्रेशन को भी संभावित भविष्य की क्षमता के रूप में देखना अधिक सही होगा।
दो सीट वाले Su-57 की चर्चा क्यों अहम है?
Su-57 के दो सीट वाले संभावित वेरिएंट को लेकर भी चर्चा हुई है। दो सीट वाला फाइटर केवल ट्रेनिंग के लिए जरूरी हो, ऐसा नहीं है। अतिरिक्त क्रू सदस्य जटिल मिशन, प्रशिक्षण और भविष्य में मानव-मशीन सहयोग जैसी क्षमताओं में भूमिका निभा सकता है।
अगर भारत और रूस भविष्य में किसी दो-सीट वाले वेरिएंट या उससे जुड़े विकास में सहयोग करते हैं, तो यह भारत को केवल तैयार विमान खरीदने के बजाय भविष्य के प्लेटफॉर्म विकास में भी भूमिका दे सकता है।
हालांकि इसे किसी तय भारत-रूस संयुक्त विकास कार्यक्रम के रूप में अभी पेश नहीं किया जाना चाहिए।
FGFA की पुरानी कहानी से कितना जुड़ता है Su-57?
भारत और रूस के बीच पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर सहयोग की कहानी नई नहीं है।
2007 के आसपास दोनों देशों ने FGFA यानी Fifth Generation Fighter Aircraft कार्यक्रम पर काम शुरू किया था। इसका उद्देश्य रूसी PAK-FA कार्यक्रम के आधार पर भारतीय जरूरतों के अनुरूप पांचवीं पीढ़ी का विमान विकसित करना था।
लेकिन लागत, तकनीकी हस्तांतरण, स्टेल्थ क्षमता, भारतीय इंजीनियरों की भूमिका और प्रदर्शन जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों की चिंताएं सामने आईं। अंततः भारत 2018 में इस परियोजना से बाहर हो गया।
इसके बाद रूस ने Su-57 को अपने स्तर पर आगे बढ़ाया।
इसलिए वर्तमान Su-57 चर्चा को पुराने FGFA प्रोजेक्ट की सीधी वापसी कहना सही नहीं होगा। हां, दोनों मामलों में पांचवीं पीढ़ी की तकनीक और भारत-रूस रक्षा सहयोग का संबंध जरूर दिखाई देता है।
Su-57 और भारत का AMCA कार्यक्रम
भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम AMCA भी भविष्य की बड़ी रक्षा परियोजनाओं में शामिल है।
इसलिए Su-57 को सीधे AMCA का विकल्प मानना उचित नहीं होगा।
भारत के सामने एक संभावित रणनीतिक विकल्प यह हो सकता है कि वह तत्काल या निकट अवधि की जरूरतों के लिए विदेशी पांचवीं पीढ़ी की क्षमता पर विचार करे और साथ ही AMCA जैसे स्वदेशी कार्यक्रम को लंबी अवधि के लिए आगे बढ़ाए।
यही कारण है कि Su-57 और AMCA को एक-दूसरे का सीधा विकल्प मानने के बजाय दो अलग-अलग समय-सीमा और जरूरतों से जोड़कर देखना ज्यादा उचित होगा।