BRICS क्या है और अमेरिका इससे क्यों परेशान है? भारत में हो रही BRICS Summit क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में होने वाली BRICS Summit को लेकर इस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा है। सवाल यह है कि आखिर BRICS इतना महत्वपूर्ण क्यों है? BRICS ने अमेरिका का क्या बिगाड़ा है? अमेरिका BRICS को लेकर इतना सतर्क क्यों दिखाई देता है और सबसे बड़ा सवाल—क्या BRICS सच में अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है?
इन सवालों को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि BRICS है क्या, इसकी शुरुआत क्यों हुई और आज इसका दायरा कितना बड़ा हो चुका है।
BRICS क्या है और इसका नाम कैसे पड़ा?
BRICS नाम पांच मूल सदस्य देशों के अंग्रेजी नामों से बना है—Brazil, Russia, India, China और South Africa। यानी B-R-I-C-S।
इस समूह की शुरुआत मूल रूप से Brazil, Russia, India और China के साथ हुई थी। 2001 में Goldman Sachs के अर्थशास्त्री Jim O'Neill ने एक रिसर्च पेपर में BRIC शब्द का इस्तेमाल इन तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए किया था।
इसके बाद 2006 में इन देशों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान अनौपचारिक स्तर पर सहयोग बढ़ाना शुरू किया। 16 जून 2009 को रूस के Yekaterinburg में पहला BRIC Leaders' Summit हुआ।
इसके बाद South Africa भी इस समूह में शामिल हुआ। South Africa ने 2011 में BRICS Summit में हिस्सा लिया और इसके बाद BRIC का नाम BRICS हो गया।
हाल के वर्षों में BRICS का विस्तार और हुआ है। अब यह केवल पांच देशों का समूह नहीं है। मौजूदा BRICS में 11 सदस्य देश शामिल हैं—Brazil, Russia, India, China, South Africa, Egypt, Ethiopia, Indonesia, Iran, Saudi Arabia और United Arab Emirates।
इसी विस्तार की वजह से BRICS को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा व्यापक Global South grouping के रूप में देखा जा रहा है।
BRICS बनाने का उद्देश्य क्या था?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल—BRICS बनाया ही क्यों गया?
इसे सीधे-सीधे अमेरिका विरोधी संगठन कहना सही नहीं होगा। शुरुआत में इसका मुख्य विचार यह था कि तेजी से उभर रही अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अपनी आवाज मजबूत करने के लिए एक मंच मिले।
भारत, चीन, रूस, Brazil और South Africa जैसे देशों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाओं में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व उनकी आर्थिक और जनसंख्या संबंधी स्थिति के अनुपात में पर्याप्त नहीं है।
IMF, World Bank और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में सुधार और ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग इसी व्यापक बहस का हिस्सा रही है।
BRICS का विचार इसलिए भी महत्वपूर्ण हुआ क्योंकि 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था 20वीं सदी के शुरुआती दशकों जैसी नहीं रही। चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं का वैश्विक आर्थिक प्रभाव काफी बढ़ा है।
2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद भी यह चर्चा तेज हुई कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका और मजबूत होनी चाहिए।
इसका मतलब यह नहीं कि BRICS ने शुरुआत से ही अमेरिका को हटाने का एजेंडा बनाया था। बल्कि इसका मूल उद्देश्य emerging economies की collective voice को मजबूत करना था।
BRICS काम कैसे करता है?
BRICS की खास बात यह है कि यह किसी पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संगठन की तरह नहीं है।
इसके पास कोई एक राष्ट्रपति, संसद या स्थायी सरकार नहीं है। इसकी अध्यक्षता हर साल अलग सदस्य देश के पास जाती है और वही देश उस वर्ष के एजेंडे और बैठकों को आगे बढ़ाता है। BRICS में स्थायी सचिवालय भी नहीं है और निर्णय आम तौर पर consensus के आधार पर लिए जाते हैं।
BRICS की गतिविधियां मुख्य रूप से तीन बड़े क्षेत्रों में देखी जाती हैं।
पहला है Political and Security। इसमें वैश्विक राजनीति, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, संयुक्त राष्ट्र में सुधार और दूसरे geopolitical मुद्दों पर बातचीत होती है।
दूसरा है Economic and Financial Cooperation। इसमें व्यापार, निवेश, वित्तीय सहयोग, भुगतान व्यवस्था, infrastructure और development जैसे मुद्दे आते हैं।
तीसरा है People-to-People Cooperation। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, खेल, युवा, पर्यटन और विज्ञान जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
सालभर अलग-अलग स्तरों पर बैठकें होती हैं और अंत में Leaders' Summit सबसे बड़ा मंच होता है, जहां सदस्य देशों के नेता प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करते हैं और साझा घोषणा जारी कर सकते हैं।
2026 में भारत के लिए BRICS की अध्यक्षता क्यों महत्वपूर्ण है?
2026 में BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है। भारत को यह जिम्मेदारी Brazil से मिली है।
भारत की अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है जब BRICS का दायरा पहले से काफी बड़ा हो चुका है और वैश्विक राजनीति में आर्थिक शक्ति, व्यापार, भुगतान प्रणाली और Global South की भूमिका पर बहस तेज है।
भारत की मेजबानी में होने वाला Leaders' Summit इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक बैठक नहीं है। इसके दौरान सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग, व्यापार, विकास, वैश्विक शासन और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों जैसे मुद्दों पर बातचीत होती है।
भारत ने अपनी BRICS chairship के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर भी काम आगे बढ़ाया है। अगस्त 2026 में Jaipur में BRICS Trade Ministers' Meeting हुई, जिसमें व्यापार, MSME finance और Global Value Chains जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
अमेरिका BRICS से क्यों परेशान है?
अब आते हैं सबसे चर्चित सवाल पर।
BRICS और अमेरिका के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है अमेरिकी डॉलर की वैश्विक भूमिका।
BRICS देशों में डॉलर पर निर्भरता कम करने, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और cross-border payment systems को बेहतर बनाने की चर्चा होती रही है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि BRICS ने कोई एक साझा मुद्रा बना ली है या अमेरिकी डॉलर को तुरंत खत्म करने की कोई योजना लागू कर दी है।
यही अंतर समझना जरूरी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने 2025 में कई बार BRICS को डॉलर के संदर्भ में चेतावनी दी थी। फरवरी 2025 में उन्होंने कहा था कि यदि BRICS देश डॉलर की भूमिका को कमजोर करने के लिए वैकल्पिक मुद्रा या व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो उन पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
जनवरी 2025 में भी Trump ने इसी तरह की 100 प्रतिशत टैरिफ चेतावनी दोहराई थी। उस समय Russia की ओर से कहा गया था कि BRICS किसी साझा मुद्रा को स्थापित करने की बात नहीं कर रहा था।
जुलाई 2025 में Trump ने BRICS देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ की चेतावनी भी दी थी, यदि वे अमेरिकी प्रशासन की नजर में anti-American policies अपनाते हैं।
इससे साफ है कि अमेरिका की चिंता केवल BRICS के नाम से नहीं, बल्कि उसके बढ़ते आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव तथा डॉलर पर निर्भरता घटाने की संभावित कोशिशों से जुड़ी है।
क्या BRICS डॉलर को खत्म करना चाहता है?
यह सवाल अक्सर सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है।
BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और cross-border payments को आसान बनाने की कोशिशों पर चर्चा जरूर होती रही है। 2026 में भारत की ओर से BRICS देशों की digital currencies/CBDC systems के बीच interoperability बढ़ाने की पहल पर भी रिपोर्टिंग हुई है।
लेकिन इसका उद्देश्य डॉलर को तुरंत दुनिया से हटाना नहीं बताया गया है। भारत ने भी payment systems को आसान बनाने पर जोर दिया है, न कि तत्काल कोई साझा BRICS currency लागू करने पर।
इसलिए “BRICS ने डॉलर खत्म करने का फैसला कर लिया” जैसी headline तथ्यात्मक रूप से बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर कही जाएगी।
असल मुद्दा यह है कि BRICS देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान में विकल्पों को बढ़ाना चाहते हैं।
New Development Bank क्यों महत्वपूर्ण है?
BRICS का एक बड़ा संस्थागत कदम New Development Bank यानी NDB की स्थापना है।
NDB का उद्देश्य emerging markets और developing countries में infrastructure तथा sustainable development projects के लिए financing उपलब्ध कराना है। इसका मुख्यालय Shanghai में है और 2026 में Dilma Rousseff इसकी President हैं।
इसे पूरी तरह World Bank का replacement कहना सही नहीं होगा। बल्कि इसे BRICS देशों द्वारा बनाया गया एक multilateral development bank समझना ज्यादा सही है।
NDB infrastructure, clean energy, transport, water और दूसरे sustainable development projects के लिए financing करता है। भारत भी इसका founding member है और बैंक की भारत में infrastructure projects में महत्वपूर्ण भागीदारी रही है।
मोदी-पुतिन और मोदी-शी जिनपिंग मुलाकातों का महत्व
BRICS Summit का महत्व केवल BRICS की सामूहिक बैठक तक सीमित नहीं रहता। इसके दौरान बड़े देशों के नेताओं के बीच bilateral meetings भी होती हैं।
भारत और Russia के बीच energy, defence, trade और geopolitical मुद्दों पर बातचीत लगातार महत्वपूर्ण रही है। BRICS Summit से पहले प्रधानमंत्री Narendra Modi और Russian President Vladimir Putin की मुलाकात भी हुई, जिसमें दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने और कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई।
वहीं भारत और China के संबंध भी BRICS के संदर्भ में खास महत्व रखते हैं। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और दूसरे मतभेद होने के बावजूद दोनों BRICS के महत्वपूर्ण सदस्य हैं।
यही BRICS की सबसे बड़ी जटिलता भी है—एक ही मंच पर ऐसे देश मौजूद हैं जिनके आपस में मजबूत आर्थिक संबंध हैं, लेकिन कई रणनीतिक मतभेद भी हैं।
BRICS की असली ताकत क्या है?
BRICS की असली ताकत केवल किसी एक देश की शक्ति नहीं है। इसकी ताकत सदस्य देशों की संयुक्त आर्थिक क्षमता, बड़ी आबादी, प्राकृतिक संसाधनों, ऊर्जा और व्यापारिक संभावनाओं में है।
लेकिन इसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
सभी सदस्य देशों की विदेश नीति एक जैसी नहीं है। भारत के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध हैं। China और America के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। Russia के पश्चिमी देशों के साथ गंभीर तनाव हैं। नए सदस्य देशों के बीच भी कई मुद्दों पर मतभेद हैं।
इसलिए BRICS को एक unified anti-America bloc मानना वास्तविक तस्वीर को बहुत सरल बना देना होगा।
भारत में हो रही BRICS Summit क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए 2026 की BRICS अध्यक्षता एक बड़ा diplomatic opportunity है।
भारत एक तरफ BRICS और Global South के साथ सहयोग बढ़ा सकता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप और दूसरे पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते भी बनाए रख सकता है।
यही भारत की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है—एक ही समय में अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखना।
इसलिए भारत में होने वाली BRICS Summit को सिर्फ “अमेरिका बनाम BRICS” के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
असल कहानी इससे बड़ी है—वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव, Global South की बढ़ती भूमिका, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, नए payment systems, development financing और दुनिया की संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग।
BRICS का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि उसके सदस्य देश अपने मतभेदों के बावजूद कितनी व्यावहारिक साझेदारी कर पाते हैं।
निष्कर्ष
BRICS की शुरुआत अमेरिका को चुनौती देने के लिए किसी औपचारिक anti-American संगठन के रूप में नहीं हुई थी। इसका मूल विचार emerging economies को एक मंच देना और वैश्विक आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था में उनकी आवाज मजबूत करना था।
लेकिन समय के साथ BRICS का विस्तार हुआ, उसका आर्थिक और राजनीतिक महत्व बढ़ा और डॉलर पर निर्भरता कम करने तथा वैकल्पिक payment mechanisms पर चर्चा तेज हुई। इसी वजह से Washington की नजर BRICS पर अधिक गंभीरता से है।
भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली के पास Global South की आवाज को आगे बढ़ाने, आर्थिक सहयोग बढ़ाने और साथ ही अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ अपने संतुलित संबंध बनाए रखने का अवसर है।
यही कारण है कि भारत में होने वाली BRICS Summit केवल एक international meeting नहीं, बल्कि बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था की दिशा को समझने का एक महत्वपूर्ण मंच बन गई है।